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#अपने एक लेख के माध्यम पहाड़ की नन्ही आशा की अनकही कहानी को व्यक्त करने का प्रयास किया है, लेख को जरूर पढ़िएगा।
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पहाड़ की नन्ही आशा : उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन की अनकही सच्चाई
उत्तराखंड के दूरस्थ पर्वतीय गाँवों में आज भी एक ऐसी दुनिया साँस लेती है, जहाँ जीवन की गति शहरों की चकाचौंध से अलग, किंतु अपने भीतर गहरी संवेदनशीलता और आत्मीयता समेटे हुए है। इसी दुनिया में पलती है एक अत्यंत ग्रामीण लड़की, जिसे अभी समाज के जटिल नियमों, संस्कारों की औपचारिक परिभाषाओं और जीवन के कठोर संघर्षों का पूरा बोध नहीं है, पर जो अपने परिवार के लिए प्रेम, जिम्मेदारी और आशा की सबसे मजबूत कड़ी बन चुकी है।
यह लड़की किसी बड़े सिद्धांत या सामाजिक विमर्श की भाषा नहीं जानती, लेकिन उसका व्यवहार स्वयं में एक जीवंत पाठशाला है। घर के आँगन में उसकी उपस्थिति मात्र से वातावरण जीवंत हो उठता है। वह माँ की थकान को बिना शब्दों के समझ लेती है, पिता के मौन में छिपी चिंता को भाँप लेती है और दादी-दादा के जीवन में स्नेह की ऊष्मा बनाए रखती है। परिवार के हर सदस्य के साथ उसका रिश्ता अलग है, पर हर रिश्ते में अपनत्व समान रूप से उपस्थित है।
ग्रामीण जीवन में आशा और निराशा साथ-साथ चलती हैं। एक ओर सीमित साधन, रोजमर्रा की कठिनाइयाँ और अभाव का यथार्थ है, तो दूसरी ओर सपनों की वह उजली दुनिया है, जो जीवन को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। यह नन्ही लड़की इन दोनों के बीच संतुलन बनाकर चलती है। वह जानती है कि घर की जरूरतें क्या हैं और परिवार की सीमाएँ कहाँ तक हैं। इसके बावजूद वह अपने दायित्वों से मुँह नहीं मोड़ती। खेती-बाड़ी में हाथ बँटाना, गाय-बछिया की देखभाल करना, पालतू मुर्गियों को दाना डालना और घर के कुत्ते को स्नेह देना, ये सब उसके लिए साधारण कार्य नहीं, बल्कि जीवन से जुड़े रिश्ते हैं।
उसकी दुनिया में पशु केवल संसाधन नहीं, परिवार के सदस्य हैं। सुबह होते ही वह मुर्गियों के लिए दाना लेकर निकल पड़ती है और शाम को पालतू कुत्ते को सहलाना नहीं भूलती। खेतों की मेढ़ों पर चलते हुए वह फसल की चिंता भी करती है और आने वाले मौसम की उम्मीद भी। इन छोटी-छोटी जिम्मेदारियों के बीच उसका बचपन कहीं खोता नहीं, बल्कि एक अलग रूप में परिपक्व होता है।
उसकी आशा का सबसे मजबूत सहारा उसका “दादी”यानी उसका बड़ा भाई है, जो रोज़गार के लिए भाबर या दिल्ली जैसे मैदानी क्षेत्रों में गया हुआ है। भाई के लौटने की प्रतीक्षा उसके जीवन की सबसे मीठी कल्पना है। वह पूरे विश्वास के साथ सोचती है कि भाई जब आएगा तो उसके लिए “झगुली”और माँ के लिए “बिलोज़”लाएगा। ये वस्तुएँ उसके लिए केवल पहनावे नहीं, बल्कि उस प्रेम और सुरक्षा के प्रतीक हैं, जिसे वह भाई के साथ जोड़कर देखती है।
सहेलियों के साथ खेलते हुए वह सहजता से कह देती है, “मेरा संसार मेरा भाई है।” इस कथन में बालसुलभ मासूमियत से अधिक एक गहरा भरोसा छिपा है। उसे लगता है कि भाई उसकी हर मनोकामना पूर्ण करेगा। यह भरोसा उसे कठिन परिस्थितियों में भी टूटने नहीं देता। वह माता-पिता की गरीबी और मुफलिसी से भली-भाँति परिचित है, पर शिकायत उसके स्वभाव में नहीं है। अभाव को वह बोझ नहीं, जिम्मेदारी मानती है।
घर के कामों में वह कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती। पानी भरना, चूल्हा-चौका, छोटे भाई-बहनों का ध्यान रखना और खेती के कामों में हाथ बँटाना,सब उसकी दिनचर्या का हिस्सा हैं। इसके साथ ही उसके कंधों पर स्कूल और पढ़ाई का बोझ भी है। पहाड़ के स्कूलों तक पहुँचने की कठिन राह, सीमित संसाधन और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच वह शिक्षा को भी उतनी ही गंभीरता से लेती है। उसकी किताबें उसके लिए केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि एक बेहतर भविष्य की आशा हैं।
अपने भाई को लिखे पत्र में वह सादे शब्दों में कहती है,“तू अपना ध्यान रख। माता-पिता, गाय-बछिया, खेती-बाड़ी, इन सबका मैं ध्यान रखने की कोशिश करूँगी।” इन पंक्तियों में उसका त्याग, संवेदनशीलता और कर्तव्यबोध साफ झलकता है। इतनी छोटी उम्र में इतना बड़ा भरोसा और जिम्मेदारी उठाना, ग्रामीण पहाड़ की बेटियों की सामान्य, पर अक्सर अनदेखी सच्चाई है।
यह नन्ही लड़की केवल एक परिवार की कहानी नहीं है; वह उत्तराखंड के ग्रामीण समाज का प्रतीक है। वह उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है, जो अभावों में भी संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और सपनों को जीवित रखती है। उसकी दुनिया साधनों में सीमित है, पर मूल्यों में समृद्ध। पहाड़ की यह नन्ही गृहलक्ष्मी आने वाले समय की वही आधारशिला है, जिस पर परिवार की स्थिरता, समाज की संवेदना और भविष्य की उम्मीदें टिकी हुई हैं।
©️ सुरेंद्र सिंह हालसी
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